Oh My Dog Movie Review: अमित राय की फिल्म में पंकज त्रिपाठी, राजेश कुमार और माही राय के साथ ऑस्कर की शानदार मौजूदगी देखने को मिलती है। जानिए कहानी, एक्टिंग, कमजोरियां और पूरी समीक्षा।
Oh My Dog Movie Review: ऑस्कर की मासूमियत और इंसानी दुनिया की कड़वी सच्चाई
Oh My Dog Movie Review: ‘ओएमजी 2’ जैसी फिल्म के जरिए सामाजिक मुद्दों को अलग अंदाज में पर्दे पर पेश कर चुके निर्देशक अमित राय एक बार फिर ऐसी कहानी लेकर आए हैं, जिसमें मनोरंजन के साथ समाज की कुछ कड़वी सच्चाइयों को दिखाने की कोशिश की गई है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार कहानी का केंद्र कोई अदालत, बहस या बड़ा सामाजिक भाषण नहीं, बल्कि एक बेजुबान कुत्ता है।
फिल्म की कहानी इंसान और उसके पालतू जानवर के बीच बने उस रिश्ते को सामने रखती है, जो कई बार शब्दों से कहीं ज्यादा मजबूत होता है। एक तरफ एक बच्चा अपने खोए हुए पालतू दोस्त की तलाश में निकलता है, तो दूसरी तरफ एक कुत्ता अपने मालिक तक पहुंचने की कोशिश करता है। इसी तलाश के दौरान कहानी कई ऐसे रास्तों से गुजरती है, जहां समाज की दूसरी तस्वीर दिखाई देती है।
विदाई से शुरू होती है कहानी
Oh My Dog फिल्म की शुरुआत पुलिस डॉग सेनापति की विदाई से होती है। इसके बाद कहानी उसके दो बच्चों ऑस्कर और मोमो तक पहुंचती है। दोनों अलग-अलग परिवारों में बड़े हो रहे हैं और उनकी जिंदगी भी अलग दिशा में आगे बढ़ रही है।
कहानी में असली मोड़ तब आता है, जब मोमो अचानक गायब हो जाता है। दूसरी ओर ऑस्कर का मालिक प्रिंस भी लापता हो जाता है। इसके बाद कहानी एक ऐसी तलाश में बदल जाती है, जिसमें इंसान और जानवर दोनों अपने-अपने साथी को खोज रहे हैं।
यही फिल्म का सबसे खूबसूरत पहलू है। कहानी सिर्फ यह नहीं बताती कि इंसान अपने पालतू जानवर से कितना प्यार करता है, बल्कि यह भी दिखाती है कि एक जानवर अपने इंसान से कितना जुड़ सकता है।
कहानी में कई सामाजिक मुद्दों की एंट्री
ऑस्कर और प्रिंस की तलाश धीरे-धीरे सिर्फ एक गुमशुदगी की कहानी नहीं रहती। रास्ते में डॉग तस्करी, किडनी रैकेट, बाल मजदूरी और गरीब मजदूरों के शोषण जैसे गंभीर मुद्दे सामने आते हैं।
Oh My Dog फिल्म की अच्छी बात यह है कि इन विषयों को लंबे-लंबे भाषणों के जरिए समझाने की कोशिश नहीं की गई है। ज्यादातर सामाजिक मुद्दे कहानी के घटनाक्रम के साथ सामने आते हैं। इससे फिल्म का संदेश अपेक्षाकृत स्वाभाविक महसूस होता है।
हालांकि, यहीं फिल्म की एक कमजोरी भी सामने आती है। कहानी एक साथ कई गंभीर मुद्दों को समेटने की कोशिश करती है। इसकी वजह से कुछ विषयों पर ज्यादा गहराई से बात नहीं हो पाती और वे सिर्फ कहानी को आगे बढ़ाने वाले हिस्से बनकर रह जाते हैं।
पंकज त्रिपाठी और बाकी कलाकारों की एक्टिंग
पंकज त्रिपाठी गांव के मास्टर के किरदार में दिखाई देते हैं। उनका अंदाज फिल्म में ज्यादा शोर नहीं करता, लेकिन किरदार को सहज और भरोसेमंद बनाने में वह कामयाब नजर आते हैं। पंकज त्रिपाठी की सबसे बड़ी ताकत उनकी नेचुरल एक्टिंग है और यहां भी वह अपने किरदार में उसी सहजता को बनाए रखते हैं।
राजेश कुमार बिहारी पुलिस अधिकारी की भूमिका में नजर आते हैं। उनका अभिनय जरूरत से ज्यादा नाटकीय नहीं लगता और यही चीज उनके किरदार को प्रभावी बनाती है।
वहीं पवन मल्होत्रा का रोल अपेक्षाकृत छोटा है, लेकिन RTO अधिकारी के रूप में वह अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में सफल रहते हैं।
निर्देशक अमित राय के बेटे माही राय इस फिल्म से बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट शुरुआत कर रहे हैं। पहली फिल्म में उनका आत्मविश्वास देखने को मिलता है। खासकर भावुक दृश्यों में वह ध्यान खींचते हैं।
हालांकि, कुछ जगह उनका किरदार उनकी उम्र के मुकाबले जरूरत से ज्यादा समझदार और चालाक दिखाई देता है। कई बार वह ऐसे सुराग तक पहुंच जाते हैं, जहां पहुंचने में पुलिस को भी ज्यादा समय लगता है। इससे कुछ दृश्य थोड़े फिल्मी महसूस होते हैं।
ऑस्कर है फिल्म का असली स्टार
अगर फिल्म में किसी एक किरदार को सबसे ज्यादा तारीफ मिलनी चाहिए, तो वह है ऑस्कर।
ऑस्कर के पास कोई डायलॉग नहीं है, लेकिन उसके हाव-भाव और स्क्रीन प्रेजेंस कई बार इंसानी कलाकारों पर भारी पड़ते हैं। कुछ दृश्यों में कैमरा जैसे ऑस्कर का पीछा नहीं करता, बल्कि ऐसा महसूस होता है कि ऑस्कर खुद कहानी को आगे लेकर जा रहा है।
इंसान और जानवर के रिश्ते को भावनात्मक बनाने में ऑस्कर की मौजूदगी फिल्म की सबसे बड़ी ताकत बन जाती है। यही वजह है कि जानवरों से प्यार करने वाले दर्शकों के लिए फिल्म के कई दृश्य खास असर छोड़ सकते हैं।
लोकेशन और म्यूजिक
फिल्म की शूटिंग में बिहार और असम की लोकेशन कहानी को जमीन से जोड़ने का काम करती हैं। गांव, छोटे शहर और आसपास का माहौल ज्यादा बनावटी नहीं लगता। यह विजुअल ट्रीटमेंट फिल्म की कहानी के लिए सही माहौल तैयार करता है।
बैकग्राउंड म्यूजिक भी भावुक दृश्यों को सपोर्ट करता है। हालांकि, गानों के मामले में फिल्म उतना प्रभाव नहीं छोड़ पाती। ऐसा कोई गाना नहीं है जिसे फिल्म खत्म होने के बाद दर्शक लंबे समय तक याद रखें।
कहां कमजोर पड़ती है फिल्म?
फिल्म का सबसे मजबूत हिस्सा ऑस्कर और उसके मालिक की भावनात्मक कहानी है। परेशानी यह है कि यह ट्रैक बीच-बीच में दूसरे सामाजिक मुद्दों की वजह से टूटता रहता है। इससे इमोशनल कनेक्शन कई जगह कमजोर हो जाता है।
डॉग तस्करी, किडनी रैकेट, बाल मजदूरी और मजदूरों के शोषण जैसे विषय निश्चित तौर पर महत्वपूर्ण हैं, लेकिन फिल्म इन्हें एक साथ लेकर चलने की कोशिश में कभी-कभी बिखरी हुई महसूस होती है।
क्लाइमैक्स से पहले कहानी रोमांच पैदा करती है, लेकिन अंतिम हिस्से में जिस स्तर का जोरदार प्रभाव बनना चाहिए था, वह थोड़ा और मजबूत हो सकता था।
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Final Verdict
कुल मिलाकर Oh My Dog एक ऐसी फिल्म है जो इंसान और जानवर के रिश्ते को आधार बनाकर समाज के कुछ गंभीर पहलुओं पर बात करती है। फिल्म की सबसे बड़ी ताकत ऑस्कर, इमोशनल कहानी, कलाकारों की सहज एक्टिंग और वास्तविक लोकेशन हैं।
वहीं इसकी कमजोरियां हैं—एक साथ बहुत सारे मुद्दों को शामिल करना, मुख्य कहानी का बीच-बीच में टूटना और कुछ जगह जरूरत से ज्यादा फिल्मी घटनाक्रम।
अगर आपको इमोशनल कहानियां, जानवरों से जुड़ी फिल्में और सामाजिक संदेश वाली फिल्में पसंद हैं, तो यह फिल्म आपको पसंद आ सकती है।
⭐ Rating: 3/5
M. S. Siddiqui Prime News 24 के संपादक और मनोरंजन विषयों के लेखक हैं। वे बॉलीवुड, फिल्मों और एंटरटेनमेंट जगत से जुड़ी खबरों को सरल, रोचक और तथ्यपरक तरीके से प्रस्तुत करते हैं। उनका उद्देश्य पाठकों को बिना अनावश्यक जटिलता के भरोसेमंद और उपयोगी जानकारी उपलब्ध कराना है।
